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कोट बांध योगीश्वर महादेव सिद्ध पीठ के महंत डॉ.जीवननाथ महाराज हुए ब्रह्मलीन

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उदयपुरवाटी, 23 अगस्त (विकास योगी)।
निकटवर्ती कोट बांध पर स्थित योगीश्वर महादेव सिद्ध पीठ के महंत व अखिल भारतीय संत समिति के प्रदेश सह संगठन मंत्री डॉ. योगी जीवननाथ महाराज रविवार अल सुबह करीब चार बजे ब्रह्मलीन हो गए। डॉ. जीवननाथ महाराज की पार्थिव देह को दोपहर 11 बजे कोट बांध स्थित आश्रम पर लाया गया। जिसके बाद में संतों ने विधि विधान के साथ में डॉ. जीवननाथ महाराज की अंतिम यात्रा निकाली। संतों ने कोट बांध पर स्थित मंदिर पर डॉ. जीवननाथ को गायत्री मंत्रोच्चारण के साथ में समाधि दी। जीवन नाथ महाराज की पार्थिव देह के अंतिम दर्शन करने के लिए आस-पास के गांवों से सैंकड़ों की संख्या में पुरूष व महिलाएं योगीश्वर सिद्धपीठ आश्रम पर पहुंचे। महाराज की पार्थिव देह आने से पहले ही आश्रम में भजनों की रसगंगा प्रवाहित की जा रही थी। जानकारी के अनुसार डॉ. योगी जीवननाथ महाराज को 14 अगस्त की सुबह आश्रम में सोते समय एक सांप ने सुबह चार बजे बिस्तर पर ही काट दिया था। सांप के काटने के बाद में महाराज की तबियत बिगड़ने लगी तो उनको उदयपुरवाटी सीएचसी में प्राथमिक उपचार देकर सीकर रैफर कर दिया। सीकर के कल्याण हॉस्पिटल में तबियत में सुधार नहीं होने पर जयपुर के सवाईमानसिंह हॉस्पिटल के लिए रैफर कर दिया। जहां पर इलाज जारी था। एक बार तो महाराज की तबियत में सुधार होना भी बताया गया है। लेकिन रविवार की अल सुबह महाराज ने अंतिम सांस लेकर ब्रह्मलीन हो गए। डॉ. जीवननाथ महाराज की शिष्या साध्वी योगश्री नाथ महाराज ने बताया कि जीवन नाथ महाराज सर्पदंश के बाद रविवार को जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल में बह्मलीन हो गए। महाराज ने हिंदु धर्म की विभिन्न संस्थाओं में कई पदों पर पदाधिकारी रहते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार किया तथा संत समाज के संगठन को भी मजबूती प्रदान करते हुए संतों को एकजुट करने का काम भी किया। इस दौरान डॉ. जीवननाथ महाराज की शिष्या डॉ. योगश्री नाथ महाराज, रमणनाथ योगी सांभर, चेतनदास महाराज व शैलेन्द्रदास महाराज मुकुंदगढ़, रघुनाथदास त्यागी महाराज, रामनारायणदास त्यागी महाराज, अनिलदास महाराज उदयपुरवाटी, हेमंतदास महाराज चिराना, मनोहरशरण दास पलसाना, योगी मोहननाथ महाराज बीदासर, रामनाथ रतनगढ़, उदयनाथ चूड़ी अजीतगढ़, मोहनदास मंडावा, भाजपा नेता राकेश जाखड़, पवन शर्मा गुढागौड़जी, राजेन्द्र मारवाल, हरिप्रसाद शर्मा कारीवाले, रोहिताश सैनी, भोजराज गुढ़ा, विश्वेश्वरलाल सैनी, बीएल सैनी, मुकेश सैनी, मुकेश बागड़ी, सतीष पटेल, महेन्द्र सैनी, शीशराम सैनी, राकेश सैनी, दिनेश शर्मा शाकम्भरी वाले, लक्ष्मणनाथ योगी, घासीराम सैनी, कैलाश आदि मौजूद थे।
24 कोसीय परिक्रमा की प्रशासन ने नहीं दी अनुमति तो गाड़ी से परिक्रमा करवाई
कोरोना वैश्विक महामारी के बढ़ते प्रकोप के चलते सरकार के द्वारा जारी एडवाइजरी की पालना को सुचारू रूप से लागू करवाने के चलते इस बार गोगा नवमी से शुरू होने वाली 24 कोसीय परिक्रमा की अनुमति प्रशासन ने नहीं दी थी। डॉ. योगीजीवन नाथ महाराज ने सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा को सुचारू रखने के लिए ठाकुरजी की पालकी को परिक्रमा करवाने की अनुमति नवलगढ़ एसडीएम से मांगी थी, पर नवलगढ़ के प्रशासन ने कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते परिक्रमा की अनुमति नहीं दी। बाद में महंत जीवननाथ महाराज ने सालों से चली आ रही परंपरा को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए ठाकुरजी को एक दिन में गाड़ी में बैठाकर पूरी 24 कोस की परिक्रमा करवाई। परिक्रमा के दौरान रास्ते में आने वाले सभी ठहरावों पर रूककर स्नान करवाकर पूजा अर्चना भी की। इस दौरान महाराज की शिष्या योगश्री नाथ, चिराना के महंत हेमंतदास महाराज व अन्य संत साथ में थे।
हादसे में हुई पत्नी की मौत के बाद बने डॉ. योगी जीवननाथ
जयपुर के राजपार्क में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का एक हॉस्पिटल चलाने वाले दिलीप शर्मा एक हादसे के बाद में योगी बन गए। प्राप्त जानकारी के अनुसार डॉ. दिलीप शर्मा जयपुर में रहते थे। उनकी पत्नी एक जनवरी 2000 को उनके पास आ रही थी। जिस दौरान रास्ते में ही शाहपुरा के निकट सड़क हादसे में पत्नी बुरी तरह घायल हो गई थी। डॉ. दिलीप को सूचना मिलने पर उनका जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल में ईलाज करवाया। लेकिन डॉ. दिलीप अपनी पत्नी वीना शर्मा को जीवन नहीं दिलवा सकें। उनकी पत्नी का 20 जनवरी को ईलाज के दौरान निधन हो गया। ठीक उसी दिन डॉ. दिलीप ने गृहस्थ जीवन का त्याग कर योगी बनने तथा तपस्या करने की ठानते हुए अपने घर कभी नहीं जाने की सोच अपने दिमाग में बैठा ली थी। ठीक उसी सोची हुई बात को ध्यान में रखते हुए गुहाला निवासी मुरारीलाल शर्मा व सावित्री देवी के बेटे डॉ. दिलीप ने सूरजगढ़ के एक आश्रम में जाकर शंभुनाथ महाराज को अपना गुरू बनाया। जिसके बाद में गुरू शंभुनाथ ने डॉ. दिलीप नाम को हटाकर डॉ. जीवननाथ महाराज नाम रख दिया। लगभग पांच वर्ष तक सूरजगढ़ व अन्य स्थानों पर तपस्या करने के बाद में लगभग 2005 में क्षेत्र के कोट बांध पर स्थित शिव मंदिर को डॉ. जीवननाथ महाराज ने संभाला। वहीं 2005 से लेकर अंतिम सांस तक कोट बांध की अनेक सुविधाओं व होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रयास करते तथा पर्यावरण को हरा भरा रखते अपने आश्रम अनेक हरे भरे जड़ी बूंटियों के पौधे लगाए तथा पशु पक्षियों के लिये खाने की हरदम व्यवस्था रखते थे।
अंतिम यात्रा में परिवार के सदस्य भी आए
डॉ. योगीजीवन नाथ महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद में अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए परिवार के सदस्य भी कोट बांध आश्रम पर आए। डॉ. जीवन नाथ महाराज समेत चार भाई व चार बहन थीं। आठ भाई-बहनों के परिवार में जीवननाथ महाराज तीसरे नंबर के थे। डॉ. जीवन नाथ महाराज की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए माता सावित्रीदेवी, भाई राकेश, रजनीश, बहन राजूदेवी, मंजूदेवी, अंजूदेवी, सुनितादेवी, भांजा सत्यम समेत परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे। बेटे की अंतिम यात्रा देखकर माता सावित्रीदेवी की आंखों से आंसू छलक रहे थे तथा कह रही थी की बेटा तेरी जगह मुझे ही उठा लेता तुझे क्यों उठाया।

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